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तुम एक जानवर हो !

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तुम एक जानवर हो , तुम्हारे अंदर जान तो है, मगर उसकी कीमत नही ! तुम्हारे पास जुबान तो है, मगर भाषा नही ! तुम रो सकते हो! चिल्ला सकते हो ! मगर अपने लिए आवाज नही उठा सकते! तुम्हारे पास चार पैर तो हैं, मगर दो हाथ नहीं ! जिससे तुम डरकर भाग तो सकते हो, मगर अपने वचाव में कलम और हथियार नही उठा सकते! तुम्हारे पास पंख तो हैं, तुम अपना घरौंदा,अपना घर,अपना घोंसला छोड़कर उड़ तो सकते हो  मगर इंसानों और मशीनों के सामने टिक नही सकते! तुम आजाद तो हो मगर तुम्हारे पास अपने मौलिक अधिकार नही! तुम्हारे पास अपना परिवार, अपनी संख्या तो है, मगर अपनी सरकार नही ! अपना संविधान नही! तुम्हारी संख्या एक झुण्ड है  क्योंकि तुम्हारी संख्या महज एक भीड़ है,  वोटर नही , मतदाता नही ! अगर होता तुम्हारे पास भी निर्वाचन का अधिकार  अगर होता तुम्हारे पास अपना वोट, तब सरकारें सुनतीं तुम्हारी भी आवाज ! जिसकी गूंज उठती गांव, कस्बे, शहर से लेकर संसद भवन तक! हिल जाती कुर्सियां शासन से लेकर प्रशासन तक ! और हो जाते अनेकों संविधान संशोधन  तुम्हारे घर के लिए, तुम्हारे वृक्षों के लिए, तुम्हारे जंगल के ...

धुंध के उस पार......एक कहानी जिंदगी की!!

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  एक कहानी जिंदगी की!   धुंध के उस पार एक गांव है। हां वही जिसका रास्ता पहाड़ी से नीचे उतरते ही एक संकरी सी सड़क से शुरू होता है। ये सड़क ज्यादा लम्बी तो नहीं लेकिन घुमाती बहुत है। सड़क पर थोड़ा चलने के बाद तिराहे पर पहुंच कर, हां वही जहां से तीनों रास्ते अपने-अपने रास्ते की ओर मुड़ जाते हैं.... हालांकि ये तीनों ही रास्ते एक दफा गांव की उस कच्ची चौपाल से गुजरते हैं जहां पर अक्सर  "राही"  कुएं का मीठा पानी पीकर अपने सफ़र को फिर से शुरू करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं.... थोड़ा और आगे चलकर एक बगीचा है, जिसका रास्ता लाल पत्थर से बना है , इस रास्ते पर थोड़ा चलने के बाद, इसका दरवाजा है जो बांस का बना है , इस बगीचे को पार करके , नदी पर बने लकड़ी के पुल से ठीक पहले ही तीनों रास्ते जो तिराहे से अलग हो गए थे,फिर से "एक रास्ता" हो जाते हैं और ये रास्ता फिर से पहाड़ों से होता हुआ नए गांव की ओर  धुंध के उस पार  चला जाता है.... हां धुंध के उस पार........

तेरे इस शहर में शोर बहुत है!!

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तेरे इस शहर में शोर बहुत है!! चल कहीं दूर चलते हैं.....तेरे इस शहर में शोर बहुत है! मैंने बहुत कोशिश की सबकी आवाज को पहचानने की मगर यहां तो हर शख्स की अपनी जुबान है। काफिले इतने हैं रास्तों पर कि किसी का हाथ टकराता है दूसरे के हाथ से.... तो कोई अपना सर टकराता है। सारे रास्ते थक चुके हैं ,यह बोझ ढोते-ढोते हजारों पैर जो पड़ते हैं रोज उसके सीने पर, हर तरफ मकान है मकानों से सटे हुए, गलियां इतनी संकरी की हवा का भी दम घुटता है.... सांसे उलझी उलझी सी आती हैं, शाम होते ही चकाचौंध हो जाता है ये शहर.....फिर भी ना जाने क्यों यहां एक धुंध सी रहती है, मैंने बहुत खोजा इंसानों को  यहां...... लेकिन यहां तो सारे मतलब के व्यापारी रहते हैं, जो बातें भी बड़े मोल भाव से करते हैं घड़ियां बहुत कीमती और शाही देखीं हैं..... मैंने दीवारों पर, लेकिन वक्त यहां किसी के पास नहीं है चल कहीं दूर चलते हैं तेरे इस शहर में शोर बहुत है!

दुःख का कारण!!

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मनुष्य के दुःख का कारण.... जरूरत से ज्यादा सोचना, और उम्मीद से ज्यादा उम्मीद करना!!

सफलता का अवसर

एक असफल व्यक्ति प्रत्येक अवसर में एक मुश्किल देखता है। किंतु वहीं एक सफल व्यक्ति प्रत्येक मुश्किल में भी एक अवसर तलाश लेता है!