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धुंध के उस पार......एक कहानी जिंदगी की!!

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  एक कहानी जिंदगी की!   धुंध के उस पार एक गांव है। हां वही जिसका रास्ता पहाड़ी से नीचे उतरते ही एक संकरी सी सड़क से शुरू होता है। ये सड़क ज्यादा लम्बी तो नहीं लेकिन घुमाती बहुत है। सड़क पर थोड़ा चलने के बाद तिराहे पर पहुंच कर, हां वही जहां से तीनों रास्ते अपने-अपने रास्ते की ओर मुड़ जाते हैं.... हालांकि ये तीनों ही रास्ते एक दफा गांव की उस कच्ची चौपाल से गुजरते हैं जहां पर अक्सर  "राही"  कुएं का मीठा पानी पीकर अपने सफ़र को फिर से शुरू करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं.... थोड़ा और आगे चलकर एक बगीचा है, जिसका रास्ता लाल पत्थर से बना है , इस रास्ते पर थोड़ा चलने के बाद, इसका दरवाजा है जो बांस का बना है , इस बगीचे को पार करके , नदी पर बने लकड़ी के पुल से ठीक पहले ही तीनों रास्ते जो तिराहे से अलग हो गए थे,फिर से "एक रास्ता" हो जाते हैं और ये रास्ता फिर से पहाड़ों से होता हुआ नए गांव की ओर  धुंध के उस पार  चला जाता है.... हां धुंध के उस पार........

तेरे इस शहर में शोर बहुत है!!

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तेरे इस शहर में शोर बहुत है!! चल कहीं दूर चलते हैं.....तेरे इस शहर में शोर बहुत है! मैंने बहुत कोशिश की सबकी आवाज को पहचानने की मगर यहां तो हर शख्स की अपनी जुबान है। काफिले इतने हैं रास्तों पर कि किसी का हाथ टकराता है दूसरे के हाथ से.... तो कोई अपना सर टकराता है। सारे रास्ते थक चुके हैं ,यह बोझ ढोते-ढोते हजारों पैर जो पड़ते हैं रोज उसके सीने पर, हर तरफ मकान है मकानों से सटे हुए, गलियां इतनी संकरी की हवा का भी दम घुटता है.... सांसे उलझी उलझी सी आती हैं, शाम होते ही चकाचौंध हो जाता है ये शहर.....फिर भी ना जाने क्यों यहां एक धुंध सी रहती है, मैंने बहुत खोजा इंसानों को  यहां...... लेकिन यहां तो सारे मतलब के व्यापारी रहते हैं, जो बातें भी बड़े मोल भाव से करते हैं घड़ियां बहुत कीमती और शाही देखीं हैं..... मैंने दीवारों पर, लेकिन वक्त यहां किसी के पास नहीं है चल कहीं दूर चलते हैं तेरे इस शहर में शोर बहुत है!