तुम एक जानवर हो !

तुम एक जानवर हो ,
तुम्हारे अंदर जान तो है, मगर उसकी कीमत नही !
तुम्हारे पास जुबान तो है, मगर भाषा नही !
तुम रो सकते हो! चिल्ला सकते हो !
मगर अपने लिए आवाज नही उठा सकते!
तुम्हारे पास चार पैर तो हैं, मगर दो हाथ नहीं !
जिससे तुम डरकर भाग तो सकते हो,
मगर अपने वचाव में कलम और हथियार नही उठा सकते!
तुम्हारे पास पंख तो हैं, तुम अपना घरौंदा,अपना घर,अपना घोंसला छोड़कर उड़ तो सकते हो 
मगर इंसानों और मशीनों के सामने टिक नही सकते!
तुम आजाद तो हो मगर तुम्हारे पास अपने मौलिक अधिकार नही!
तुम्हारे पास अपना परिवार, अपनी संख्या तो है,
मगर अपनी सरकार नही ! अपना संविधान नही!
तुम्हारी संख्या एक झुण्ड है 
क्योंकि तुम्हारी संख्या महज एक भीड़ है, 
वोटर नही , मतदाता नही !
अगर होता तुम्हारे पास भी निर्वाचन का अधिकार 
अगर होता तुम्हारे पास अपना वोट,
तब सरकारें सुनतीं तुम्हारी भी आवाज !
जिसकी गूंज उठती गांव, कस्बे, शहर से लेकर संसद भवन तक!
हिल जाती कुर्सियां शासन से लेकर प्रशासन तक !
और हो जाते अनेकों संविधान संशोधन 
तुम्हारे घर के लिए,
तुम्हारे वृक्षों के लिए,
तुम्हारे जंगल के लिए,
तुम्हारे वोट के लिए !
मगर अब आवाज उठाए भी कौन और क्यूं ?
किसे जरूरत है तुम्हारी,
क्या औकात है तुम्हारी?
तुम्हारा घर छिन रहा है 
तुम्हारा जंगल कट रहा है,
तुम्हारा यही दुर्भाग्य है,
तुम्हारी यही सजा है,
क्योंकि तुम एक पक्षी हो,
क्योंकि तुम एक जानवर हो !

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