तेरे इस शहर में शोर बहुत है!!

तेरे इस शहर में शोर बहुत है!!

चल कहीं दूर चलते हैं.....तेरे इस शहर में शोर बहुत है! मैंने बहुत कोशिश की सबकी आवाज को पहचानने की मगर यहां तो हर शख्स की अपनी जुबान है।

काफिले इतने हैं रास्तों पर कि किसी का हाथ टकराता है दूसरे के हाथ से.... तो कोई अपना सर टकराता है।

सारे रास्ते थक चुके हैं ,यह बोझ ढोते-ढोते हजारों पैर जो पड़ते हैं रोज उसके सीने पर,

हर तरफ मकान है मकानों से सटे हुए, गलियां इतनी संकरी की हवा का भी दम घुटता है.... सांसे उलझी उलझी सी आती हैं,

शाम होते ही चकाचौंध हो जाता है ये शहर.....फिर भी ना जाने क्यों यहां एक धुंध सी रहती है,

मैंने बहुत खोजा इंसानों को  यहां...... लेकिन यहां तो सारे मतलब के व्यापारी रहते हैं, जो बातें भी बड़े मोल भाव से करते हैं

घड़ियां बहुत कीमती और शाही देखीं हैं..... मैंने दीवारों पर, लेकिन वक्त यहां किसी के पास नहीं है

चल कहीं दूर चलते हैं तेरे इस शहर में शोर बहुत है!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तुम एक जानवर हो !